पुण्यभुमि-बाबा साहब  की जन्मभुमि
        लेखक्‌‌-कांतिलाल रूपाभाई परमार





       कई सालो से बाबासाहब कि जन्मभुमि के दर्शन करने कि  ख्वाइश थी ,जो इस हप्ते पुरी हुई ।परिवर्तन संसार का नियम हे लेकिन  क्रांति तो कोइ विरल आत्मा हि कर शक्ता हे । ऐसे विरल आत्मा थे हमारे बाबा साहब्। ऐसे महान पुरुष कि जन्मभुमि को माथा टेकना कोइ जैसी वैसी बात नहि । मुझे गर्व हे कि मै इस मकाम तक पहोच शका हु ।
     हिंदी के जानेमाने लेखक महाशय रामवृक्ष बेनीपुरी जी को जो आन्न्द शेक्सपियर कि जन्मभुमि देखने के बाद मिला था इस से कई गुना ज्यादा आन्न्द मुझे बाबा साहब आम्बेडकरजी के जन्मस्थल पर पहोच कर हुआ । मेरे अजीज दोस्त पुनमभाई ,भुराभाई,सुरेशभाइ, जगदीशभाई और रतिलालजी ने मध्यप्रदेश मे घूमने का प्लान बनाया , मेरे सारे प्रोग्राम बीच मे हि रुकवा के मुझे भी उनके साथ सामिल किया।
        फरवरी के पुर्ण होने कि बुल्कुल तैयारे के दिनो मे हम सब निकले मध्यप्रदेश  कि ओर्। मेरा ए मध्यप्रदेश दोरा सर्व प्रथम था । हमारे देश के कई राज्य मे घूम चुका हु लेकिन मध्यप्रदेश गुजरात से काफि नजदिक होने के बावजुद मे नही जा शका । आज सुंदर परिस्थितियां कि वजे से मे मेरे दोस्तो के साथ पुण्यभुमि कि ओर निकल पडा ।
   जब से हम सब ने ठान लि कि हम सब बाबा साहब कि जन्मभुमि के दर्शन करने वाले हे दिल के धडकने का तरीका ही बदल गया। करीब साम के साडे सात बजे के बाद हमारी इनोवा गाडी महुं पहोची ।पहले तो महुं के स्पेलिंग ने हमे बहोत परेशान किया ,मुझे विचार आ रहे थे के आज इतनी टेकनोलोजी के बावझुद मै इतना परेशान हो रहा हु  , रास्ता ढुंढ नही पा रहा हुं बाबा के दिनो मे तो कितनी मुश्किल परिस्थितियां थी  जो ए सामाजिक रास्ता जो नया बनाना था ??
    महुं शहर कि हवा  मुझे नई ताजगी दे रही थी , मेरे आठ सो किमि के प्रवास के थकान को चंद सेकंडो मे मुझे  स्फुर्तीमय बना दिया ।मैंने ओर मेरे साथी ओ ने कई तसवीरे खींची लेकिन मेरे स्मृतीपट पर जो तसवीर आइ हे हो तो जिंदगीभर जाने वाली नही हे जी।
  महुं मे बडे लम्बे समय घूमने के बाद मेरा एक मित्र एक सैन्य अधिकारी को जाके प्रश्न किया कि  हम गुजरात से आये हे ओर हमे बाबासाहब कि जन्मभुमि के दर्शन करने हे , उस साहब जी ने बडे सरल तरीके से हमे रास्ता बताया तब जाकर के हम बाबा साहब कि जन्मभुमि पहोच शके । अंग्रेजो के जमाने कि लश्करी छावानी आज भी हे , उस छावनी के नजदीक मे बाबासाहब का भव्य स्मारक हे । दूर से ही बाबा साहब जी कि भव्य प्रतिमा का दिदार होता हे । सब से पहले हम सब दोडते हुए सीधे बाबा के चरनो मे पहोचे । फोटो खींचने का काम भी जारी रहा । मुझे तो स्मारक बौध्ध स्तुप जेसा दिखाई दिया , फीर भी जैसी जिंनके  देखने कि स्टाईल ।
     बाबा साहब डो. आम्बेडकरजी  स्मारक के होल मे प्रवेश करते ही मेरे रोम-रोम मे लहु कि तरंगे अपना लय छोड देती हो ऐसा लगता था। उनकी प्रतिमा के आगे मे नतमस्तक हो गया। वहा  महाराष्ट्रा से एक दल आया हुआ था उनके आगे तीन बौध्ध साधु बेठे हुए थे, उंनकी बाते मराठी मे होती थी लेकिन एक बात समज मे आ गई कि उनका मुद्दा तो बाबा साहब ही थे।
     बाबा साहब के स्मारक के पीछे वाले  भाग मे उनकी अस्थि रखी गई हे ।  अस्थि कुम्भ के आगे एक दान पेटी रखी हुई थी ,सब ने यथा शक्ति दान डाला उस समय हम सब ने खास करके पुनमभाई ओर साथी ओ ने एक बात कही कि दान डाल ने कि सही जगह यही हे । वहां पे बाबा साहब के विचार प्रकट करते ढेर सारी किताबे थी जो आप किसि भी प्रकार कि रियायत के बिना खरीद शकते हे ।रियायत न मिलने वजह मोहनराव ये बता रहे थे की की राजकिय और सामाजिक नेतागीरी का अभाव। हम सब ने खरीदी, पुनम भाईने बौध्ध धर्म  ग्रंथ त्रिपिटक और दुसरी ढेर सारी किताबे ली । मै ने भी बाबा साहब कि  लिखी हुई किताब पाकिस्तानली । उस मे भारत- पाकिस्तान विभाजन कि बाते हे जो आज-कल मे उसका पठन और मनन कर रहा हुं ।समय मिलने पर वो बाते भी इस ब्लोग पर रखुगा।
    बाबा साहब  स्मारक के मुखिया मोहनराव जी से जीभर के और दिल खोल कर बाते कि ।बाबासाहब के वंशज भी समय समय पर यहां आते रहते हे ऐसी बाते कि । मोहनरावजीका एक बडा सा फोटो हमारे प्रधानमंत्री जी के साथ का था वो भी देखा । राजकिय ,सामाजिक परिपेक्ष के अनुरूपभी कई बाते हुई ।स्मारक के पास मे एक लायब्रेरी और एक धर्मशाला हो जाय ऐसी मांग उन्हो  ने प्रशाशन के पास रखी हे।
     महु से बहार नीकलते समय एक बडी विध्यापीठ दीखाई दी उसका नाम देखने के बाद खुशी दोगुनी हो गई जी............. नाम था...” डॉ. बाबा साहब आम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्व विध्यालय
   हरीपुरा से महुं तक कि महा धर्म यात्रा  शुभ रही................ आप सब के जीवन मे भी खुशीयां बनी रहे ऐसी शुभकामना.............अगर आप को बाबा साहब कि जन्मभुमि जाने का विचार आ जाये तो मुझे बडी खुशी होगी। आधुनिक भारत के भाग्य विधाता को वंदन के साथ यहां पे मेरी बात पुरी कर रहा हुं । लिखने मे कोइ क्षति रह गई हो तो क्षमा करना, ये देवनागीरी लिपि मे मेरा पहला प्रयास हे। आप के सुझाव का इंतझार रहेगा। बाबा साहब के क्रांति के प्रयास आप सब कि नसो मे बहते रहे यही शुभकामनाओ के साथ... जय भारत ।
       [प्रवास २३ से २६ फरवरी २०१७]
  लेखा लिखने कि दिनांक और समय  २८ फरवरी २०१७  साम ८.१२

         लेखक: कांतिलाल रूपाभाई परमार










ओलफोटो:कांतिलाल  और  साथी मित्र
 मोबाईल्   ०९५८६५३७५६५


Comments

  1. અમને પણ પુણ્યભુમી નાં ઘેર બેઠાં દર્શન થઇ ગયાં.

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  2. અમને પણ એ પવિત્ર પુણ્યભુમી ના દર્શન ઘેર બેઠા થઇ જીસ.

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